Monday, 29 February 2016

                 महानगर और मॉल#                                    शनिवार और रविवार की शाम अगर आप किसी परिचित या मित्र या रिश्तेदार के यहाँ आमंत्रित नहीं हैं, और ना ही आपने किसी को आमंत्रित किया है, तो अपनी शाम गुजारने के लिए शायद आप या तो थोडी देर मंदिर हो लेंगे या पार्क का चक्कर लगा लेंगे या होटल चले जाएंगे। हो सकता है किसी सांस्कृतिक कार्यक्रम में भी चले जाएं, पर संभावना ज्यादा महानगर में 'मॉल' में जाने की ही होती है।
सो महानगर का बाशिंदा अपने खालीपन और अकेलेपन को कम करने के लिए मॉल की शरण लेता है। वहाँ जाने की तैयारी अलग तरह से होती है। कपडे मेकअप और भारी जेब ।सभी में तैयारी नजर आती है। मॉल इस तरह' गिरफ्त' में लेता है कि अनावश्यक खरीदारी होती ही है।
माॉल से लौटने के बाद चेहरे पर जो खुशी दिखाई पडती है वह भ्रामक होती है। विषमता और असंतोष को बढाने वाली ।
मानव जीवन को स्वस्थ और गतिशील क्या मॉल संस्कृति बना सकती है ?
मानव जीवन में यह कैसी विकृतियाँ पैदा कर रही है यह वहाँ जानेवाला क्या पहचानता है ?
महानगर कहाँ ले जाएगा ?